यूपी के बहराइच में राजा सुहेलदेव राजभर की सेना से हुए संघर्ष में शहीद हो गए सालार मसूद गाजी पर ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम फिदा है। नौ जुलाई , 2021 एआईएमआईएम चीफ असुद्दीन ओवैसी ने उनकी दरगाह पर पहुंचकर सजदा भी किया है। अब उनकी पार्टी दरगाह स्थल पर साफ-सफाई को मुद्दा बनाकर प्रदर्शन कर रही है।

बहराइच में सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर साफ-सफाई को मुद्दा बनाकर ओवैसी ने प्रदर्शन के साथ अपने इरादे साफ कर दिए हैं। यूपी में मुसलमानों को रिझाने के लिए एआईएमआईएम बेकरार है। उसकी बेकरारी को यूं भी समझा जा सकता है कि मुस्लिमों की भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर बयानबाजी के साथ ही उसने सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर ध्यान केंद्रित कर दिया है।

बीती नौ जुलाई को असुद्दीन औवेसी ने गाजी मियां की दरगाह पर पहुंचकर सजदा किया है। बुधवार एक सितंबर को उनकी पार्टी के यूपी चीफ शौकत अली ने नगर पालिका परिषद पर समर्थकों के साथ प्रदर्शन किया है। वह चाहते हैं कि गाजी मियां की दरगाह के आस-पास के हिस्सों की साफ-सफाई व सौंदर्यीकरण हो।

इसे मुद्दा बनाते हुए उन्होंने एक पोस्टर भी जारी किया है जिसमें सालार मसूद की दरगाह के पास कूड़े का ढेर दिखाया है। उन्होंने पोस्टर में कहा है कि सालार की सर जमीन साफ करो। कौन हैं सालार मसूद , कैसे बने गाजी सैयद सालार मसूद गाजी या गाजी मियां की बहराइच में दरगाह है। उनके बारे में कहा जाता है कि​ वह महमूद गजनवी के भांजे थे। भारत विजय के अभियान में बहराइच पहुंचे थे। यहां उनका भीषण युद्ध महाराजा सुहेलदेव के साथ हुआ।

जिन्हें राजभर समाज के लोग अपना पूर्वज मानते हैं। इस युद्ध में गाजी मियां की सेना पराजित हुई। सालार मसूद के बारे में हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं हैं। इन्हें किंवदंती ही माना जाता है लेकिन इस कथा के अनुसार अजमेर के मुसलमानों ने गजनी के सुल्तान महमूद गजनवी से हिंदू राजाओं को पराजित करने के लिए मदद मांगी थी। महमूद के सेनापति सालार साहू ने आकर हिंदू राजाओं को हराया।

इससे खुश होकर महमूद गजनवी ने अपनी बहन का निकाह सालार के साथ कर दिया। इन्ही सालार का बेटा सालार मसूद था जो 16 साल की उम्र में भारत विजय के लिए निकल पड़ें। और एक के बाद एक राजा को पराजित करते हुए 18 साल की उम्र में दिल्ली पर कब्जा जमाया। बाद में मेरठ, कन्नौज होते हुए वह लखनऊ के निकट सतरिख पहुँचे। यहां उन्होंने अपना केंद्र बनाया और पूर्व, उत्तर व पश्चिम के शहरों को जीतने के लिए सेना भेज दी। हमेशा जितने और लड़ते लड़ते शहीद होने की वजह से उन्हें गाजी कहा गया ।

लेकिन जब उनके पिता की मौत के बाद बहराइच में उसकी सेना हार गई तो वहां लड़ने के लिए वह खुद पहुंच गए। राजा सुहेलदेव के साथ यहां उनकी सेना लड़ी लेकिन पराजित हो गई। इस युद्ध में सालार मसूद भी शहीद हो गए। इसके बाद राजा सुहेलदेव को हिंदू नायक के तौर पर याद किया जाने लगा जबकि सालार मसूद के समर्थकों ने उन्हें गाजी मियां कहकर याद करना शुरू कर दिया। जहां वह शहीद हुए वहीं पर उनकी मजार बनाई गई जिसे गाजी मियां की दरगाह कहा जाता है। इस दरगाह पर हर साल मेला लगता है। इसमें हिंदू – मुस्लिम दोनों शामिल होते रहे हैं।

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