मुजफ्फरनगरः उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की 6 विधानसभा सीटों पर पहले चरण में ही वोट डाला जाएगा। यानी दस फरवरी को बुढ़ाना,चरथावल,पुरकाजी,मुजफ्फरनगर,खतौली और मीरापुर की सीटों पर मतदान होगा।मुजफ्फरनगर जिले की छह विधानसभा सीटों पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी में सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने रालोद के जयंत चौधरी से गठबंधन कर लिया है। सपा और रालोद की गठबंधन की वजह से बीजेपी को मुजफ्फरनगर जिले की छह विधानसभा सीटों पर मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है।

आइए मुजफ्फरनगर जिले की छह विधानसभा सीटों के समीकरण पर डालते हैं एक नज़र
मुजफ्फरनगर के छह विधानसभा सीटों के जातीय समीकरण पर अलग अलग गौर करना जरूरी है। 2017 में मुजफ्फरनगर सदर विधानसभा सीट से बीजेपी के कैंडिडेट कपिल देव अग्रवाल विधायक चुने गए थे। मुजफ्फरनगर सदर विधानसभा सीट के चुनावी नतीजे को तय करने में वैश्य समाज की निर्णायक भूमिका रहती है। वहीं जाट, मुस्लिम, ब्राह्मण, जाटव, बाल्मिकी और कश्यप वोटर भी चुनावी नतीजों पर असर डाल सकते हैं। 2022 में इस सीट पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के कैंडिडेट में सीधी टक्कर होगी।

वहीं मुजफ्फरनगर के पुरकाजी विधानसभा सीट पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रमोद ऊंटवाल बाल्मीकि ने बीजेपी की टिकट पर पुरकाजी सीट से जीत का परचम लहराया था। वहीं 2012 के विधानसभा चुनाव में पुरकाजी सीट से बसपा के अनिल कुमार विधायक बने थे। पुरकाजी विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा मुस्लिम, जाट, जाटव, गुर्जर और त्यागी मतदाता हैं। य़हां करीब एक लाख मुस्लिम, 60 हजार जाटव और 25 हजार जाट मतदाता हैं। इनके अलावा यहां पाल, ब्राह्मण, त्यागी और ठाकुर वोटर भी बहुत अधिक संख्या में हैं। अगर इस सीट पर बीएसपी ने मजबूत प्रदर्शन किया तो वह सपा और बीजेपी को पीछे छोड़ सकती है।

वहीं मुजफ्फरनगर जिले की चरथावल सीट पर मुस्लिम वोटरों का असर है। 2017 में चरथावल सीट से बीजेपी उम्मीदवार विजय कुमार कश्यप ने जीत दर्ज की थी। इससे पहले 2002 से 2012 तक लगातार यहां से बसपा कैंडिडेट ने ही चुनाव में जीत हासिल की थी। चरथावल विधानसभा सीट में मुस्लिम, जाटव, कश्यप, जाट और ठाकुर जाति के वोटरों की तादाद सबसे अधिक है। यहां करीब 70 हजार मुस्लिम, 30 हजार जाटव, 30 हजार कश्यप, 29 हजार जाट और करीब 21 हजार ठाकुर वोटर हैं। इनके अलावा 32 हजार गुज्जर और 25 हजार ब्राह्मण वोटर भी जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं त्यागी, प्रजापति और वाल्मीकि वर्ग के वोटर भी यहां हैं। अगर यहां सपा और रालोद का गठबंधन चल गया तो बीजेपी इस सीट को हार भी सकती है।

वहीं मुजफ्फरपुर के बुढाना विधानसभा सीट पर भी सपा और बीजेपी में कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। गौरतलब है कि किसानों के मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का गांव सिसौली बुढाना विधानसभा का ही हिस्सा है। इसलिए यहां किसान आंदोलन भी एक चुनावी फैक्टर साबित हो सकता है। 2017 में बीजेपी के टिकट पर उमेश मलिक ने यहां से चुनाव जीता था। पिछले दो चुनावों से यहां सपा और बीजेपी के बीच बराबर की टक्कर देखने को मिल रही है। बुढाना सीट पर मुस्लिम, जाटव, जाट और कश्यप वोटरों की तादाद ज्यादा है। यहां एक लाख 40 हजार मुस्लिम, 61 हजार जाटव, 63 हजार जाट और 30 हजार कश्यप वोटर हैं। वहीं सैनी, त्यागी, पाल, ब्राह्मण, वाल्मीकि, प्रजापति और राजपूतों के अलावा कई अन्य जाति के लोग भी यहां रहते हैं। वहीं सपा की भूमिका भी इस सीट पर अहम रहेगी। बसपा दोनों ही पार्टियों के वोट काटने की भूमिका में रह सकती है।

वहीं 2017 में खतौली विधानसभा सीट से बीजेपी के विक्रम सैनी विधायक चुने गए थे। उन्होंने समाजवादी पार्टी के चंदन सिंह चौहान को चुनाव में मात दी थी। चौथे नंबर पर आए रालोद के शाहनवाज राणा को यहां 12 हजार 846 वोट मिला था। खतौली विधानसभा सीट पर लगभग 80 हजार मुस्लिम, 60 हजार जाटव, 30 हजार सैनी, 20 हजार पाल और करीब 18 हजार कश्यप वोटर हैं। इनके अलावा यहां गुर्जर, प्रजापति, जाट, ठाकुर और वैश्य वोटर भी हैं।

वहीं मुजफ्फरनगर के मीरापुर सीट पर 2017 में बीजेपी कैंडिडेट अवतार सिंह भड़ाना को महज 193 वोटों से जीत मिली थी। अवतार सिंह भड़ाना ने समाजवादी पार्टी के कैंडिडेट लियाकत अली को हराया था। वहीं इस सीट पर आरएलडी के मिथिलेश को 22 हजार 751 वोट मिले थे। इस बार सपा और आरएलडी का गठजोड़ यहां से बीजेपी कैंडिडेट के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता है। अगर जातीय समीकरण की बात करें तो यहां पिछड़ी जातियों के 35 फीसदी मतदाता हैं। जाट, गुर्जर, झोझा मुस्लिम, कश्यप और पाल वोटर भी यहां जीत हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

बीजेपी सरकार ने दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे, दिल्ली से हापुड़, मेरठ से बुलंदशहर तक का राष्ट्रीय राजमार्ग का काम करवाया है। वहीं गन्ने के मूल्य में भी सरकार ने 25 रुपए का इजाफा किया था, हालांकि अभी भी गन्ना के पेमेंट को लेकर किसानों में नाराजगी है। मोदी सरकार ने किसानों की नाराजगी कम करने के लिए तीनों कृषि कानून भी वापस ले लिए हैं, हालांकि समाजवादी पार्टी और रालोद के गठबंधन से बीजेपी को क़ड़ी टक्कर मिल रही है। अब आने वाला वक्त ही बताएगा कि 2022 के विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर जिले की जनता किस पार्टी के कैंडिडेट का राजतिलक करेगी।

Share this article

ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या  ट्विटर पर फॉलो करें.

The world is about to receive just the news it needs. My team and I believe that journalism can change the world and we are on a mission to ensure that this happens.

Leave a comment