ऩई दिल्ली. हैदराबाद में रहते हैं अनिल कुमार चौहान. धर्म से हिन्दू और पेशे से क़ातिब (Calligrapher)… चौहान अबतक सौ से ज्यादा मस्जिदों की दीवार पर कुरान की आयतें लिख चुके हैं. वह भी पूरी तरह निशुल्क यानी बिना एक पैसा लिए.

निजामों के शहर हैदराबाद (Hyderabad), जिसे कुछ लोग भाग्यनगर (Bhagyanagar) भी कहते हैं, अपनी दक्कनी बोली, बिरयानी और समृद्ध विरासत को लेकर प्रसिद्ध है. इस शहर में रहते हैं अनिल कुमार चौहान. आसपास रहने वाले बहुत कम लोग उनको जानते हैं, लेकिन हैदराबाद की मस्जिदों की व्यवस्था से जुड़े लगभग सभी लोग उनको जानते-पहचानते और मानते हैं. दरअसल, चौहान साहब कुरानशरीफ की आयतें बेहद कलात्मक तरीके से मस्जिद की दीवारों पर लिखते हैं और वह भी बिना कोई मेहनताना लिए. शहर और आसपास की सौ से ज्यादा मस्जिदों में उनकी कला का जादू बोल रहा है. अरबी फारसी के जानकार उनकी लिखावट के मुरीद हैं.

एक हिन्दू क़ातिब कैसे बना अरबी-फारसी का उस्ताद
पुराने हैदराबाद की तंग बस्ती में रहने वाले अनिल कुमार चौहान पहले साइनबोर्ड पेंटिंग का काम करते थे. तब निजामी शहर में दुकानों के बोर्ड उर्दू में लिखने का चलन था. अनिल को सुंदर कलात्मक लिखाई आती थी, लेकिन उर्दू नहीं. ग्राहक ने जैसा लिखकर दे दिया उसे ही हू-ब-हू उतार दिया करते थे. अचानक उनको उर्दू जानने-समझने की चाह जगी. उन्होंने लगातार मेहनत कर उर्दू पढ़ना-लिखना सीख लिया. चौहान बताते हैं, ‘हमारी लिखावट से खुश होकर एक मुस्लिम ने सबसे पहले मस्जिद-ए-नूर की दीवारों पर कुरान की आयतें लिखने का ऑडर दिया. फिर तो यह काम मेरा शौक बन गया. ऐसा करते हुए 25 साल हो गये. अबतक हैदराबाद और आसपास की सौ से ज्यादा मस्जिदों में मैंने कुरान की आयतें, हदीस के पाठ और अब कलमा सूत्र लिख चुका हूं. सालों तक फ्री ऑफ कॉस्ट यह काम किया. अब मामूली रकम चार्ज करता हूं.’

हिन्दू होने के चलते विरोध भी झेला
अनिल कुमार चौहान को उर्दू-अरबी सीखने में बहुत परेशानी नहीं हुई, लेकिन मस्जिद में कुरान की आयतें गैर इस्लामी (हिन्दू) द्वारा लिखे जाने पर कुछ मुस्लिमों ने आपत्ति जताई. उनकी आपत्तियां दूर करने के लिए चौहान ने जामिया निजामिया इस्लामिया से गुहार लगाई जो दक्षिण में इस्लामी शिक्षा का (Islamic seminaries of higher learning) सबसे पुराना और बड़ा केन्द्र है. वहां अपने काम को बताया-दिखाया. चौहान कहते हैं, ‘जामिया निजामिया (Jamia Nizamia) ने पाक साफ रहकर मस्जिदों में आयतें लिखने की इजाजत दे दी.

अब उनको कोई परेशानी नहीं होती. मुस्लिम विद्वान, मौलाना और मस्जिद कमेटियों से जुड़े लोग उनको आदर देते हैं और काम की सराहना करते हैं. उनकी लिखी हुई कुरान की सूरा यासीन 

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