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Saturday, December 3, 2022
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सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रमना ने किया आगाह, चुनाव जीतकर आए शासक भी बन सकते हैं तानाशाह

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना की यह चेतावनी उल्लेखनीय है कि कुछ वर्षों के अंतराल में चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने का अधिकार यह गारंटी नहीं देता कि शासक को तानाशाह के समान आचरण करने से रोका जा सकता है. यही आशंका 1973 के केशवानंद भारती निर्णय में भी व्यक्त की गई थी कि संविधान का मूलभूत लोकतांत्रिक ढांचा बनाए रखा जाए ताकि कोई निर्वाचित शासक तानाशाह न बनने पाए. इसके 2 वर्ष बाद लगाए गए आपातकाल में भी यही होता देखा गया. कुछ शासक एकाधिकारी मनोवृत्ति के होते हैं और मनमानी करते हैं. 

ऐसे राजनेता सोचते हैं कि जनता ने उन्हें वह सब करने की खुली छूट दे दी है, जिसे वे सही समझते हैं. जनता प्राय: ऐसे नेताओं को चुनती है जो उसकी समस्याओं का आसान हल देने का वादा करते हैं. यदि कोई सरकार 2 बार बहुमत से जीत जाए तो वह स्वयं को बेहद ताकतवर मानकर विपक्ष को नजरअंदाज करते हुए फैसले लेने लगती है. यह तथ्य है कि जब 1975 में आपातकाल लगाया गया था, तब मूलाधिकार स्थगित कर दिए गए थे और सरकार की ओर से प्रतिबद्ध न्यायपालिका (कमिटेड ज्युडीशियरी) पर जोर दिया गया था. 

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इस समय भी कानून बगैर पर्याप्त चर्चा किए आपाधापी में बनाए जाते हैं. विपक्ष की अवहेलना करना और चयन समिति के पास विचार के लिए भेजे बिना ध्वनिमत से कानून बना लेना कुछ ऐसा ही संकेत देता है. कितने ही निर्णयों में विपक्ष की राय नहीं ली जाती.

सोशल मीडिया से न्यायदान प्रभावित न हो

चीफ जस्टिस एनवी रमना का यह परामर्श बिल्कुल उचित है कि जज सोशल मीडिया से प्रभावित न हों. मीडिया ट्रायल को किसी भी मामले में निर्णय की वजह नहीं बनना चाहिए. उन्होंने स्वीकार किया कि सोशल मीडिया का संस्थानों पर असर होता है और जो कुछ भी समाज में होता है, उससे जज और न्यायपालिका अछूते नहीं रहते हैं. जजों को ध्यान रखना चाहिए कि किसी बात का ज्यादा शोर होना हमेशा यह तय नहीं करता कि वह सही है. नए मीडिया टूल्स में यह ताकत है कि उनकी राय सभी को ज्यादा सुनाई देती है लेकिन सोशल मीडिया में वह क्षमता नहीं है कि वह सही या गलत, अच्छे या बुरे और सच या झूठ में अंतर कर सके. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर होने वाला शोर बहुमत का दृष्टिकोण नहीं होता. कार्यपालिका के दबाव की बहुत चर्चा होती है लेकिन सोशल मीडिया को लेकर भी बहस होनी चाहिए कि वह संस्थाओं के कामकाज को कैसे प्रभावित करता है.

जनता समझदार है

न्यायमूर्ति रमना ने कहा कि देश में आजादी के बाद से 17 आम चुनाव हो चुके हैं और जनता ने 8 बार सत्तारूढ़ दल या गठबंधन को अपने वोटों से बदलकर दिखाया है. यद्यपि हमारे देश में बड़े पैमाने पर असमानता, पिछड़ापन, गरीबी और निरक्षरता है, फिर भी लोगों ने चुनाव करते समय खुद को बुद्धिमान साबित किया है. अब यह सरकार के अंगों को सोचना है कि क्या वे संवैधानिक जनादेश के अनुरूप काम कर रहे हैं?

कानून सरल होने चाहिए

चीफ जस्टिस ने मत व्यक्त किया कि कानून स्पष्ट भाषा में होने चाहिए तथा जनता की उन तक पहुंच होनी चाहिए. कानूनों में गोपनीयता नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये समाज के लिए बने होते हैं. न्यायाधीशों को जनमत की उस भावुकता से प्रभावित नहीं होना चाहिए जिसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म और बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं.

न्यायपालिका को पूर्ण आजादी हो

लोकतंत्र में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका तीनों अहम स्थान रखते हैं तथा संविधान के अनुसार तीनों ही बराबरी के भागीदार हैं. यदि सरकार की ताकत और उसके किसी कदम पर कोई अंकुश लगाना है तो न्यायपालिका को पूरी आजादी होनी चाहिए. न्यायपालिका पर सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर विधायिका का कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए. यदि ऐसा होता है तो कानून का शासन फिर वैसा नहीं रह जाएगा.

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Jamil Khan
Jamil Khan
Jamil Khan is a journalist,Sub editor at Reportlook.com, he's also one of the founder member Daily Digital newspaper reportlook
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