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उस्मानिया सल्तनत के दौर का “जनरल कदूर बिन ग़बरीत जो मुफ्ती बना हुआ था”

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1924 ईस्वी में खिलाफत उस्मानिया का खात्मा हुआ 1925 ईसवी में फ्रांस ने दमिश्क पर बमबारी की आलम ए इस्लाम के बहुत सी शख्सियतों ने इस बमबारी की हिमायत की जैसा कि मौजूदा जमाने में कई लोगों ने दहशत गर्दी के खिलाफ जंग के नाम पर इस्लाम के खिलाफ सलीबी जंग की हिमायत की
इनमें से एक पेरिस की मस्जिद का इमाम भी था याद रहे कि यही वह मस्जिद है जिसके इफ्तातह के लिए फ्रांस ने शायर ए मशरिक डॉक्टर अल्लामा मोहम्मद इकबाल को दावत दी थी और अल्लामा इकबाल ने यह कहकर उस दावत को रद कर दिया था कि यह दमिश्क को जलाने और तबाह करने की बहुत कम कीमत है 
इस मस्जिद का पहला इमाम और खतीब कदूर बिन गबरीत को मुकर्रर किया गया था यह आदमी अल जज़ायर में एक मुफ्ती के तौर पर जाना जाता था मगर हकीकत में यह बहुत पहले बिका हुआ था 
और फ्रेंच इंटेलिजेंस का अफसर था इसी ने खिलाफत उस्मानिया को गिराने के लिए बरतानिया से मदद लेने के जवाज का भी फतवा दिया था इसी के फैसले के बाद ही मुसलमानों ने पहली आलमी जंग में फ्रांस की फौज में शामिल होकर खिलाफत उस्मानिया के खिलाफ लड़ना शुरू किया
इसी ने खलीफा मोहम्मद रशाद पंजम को बगावत का फतवा दिया और अरबों को उनके खिलाफ खरूज की दावत दी 
शायर ए मशरीक अल्लामा मोहम्मद इकबाल की तरफ से इस मस्जिद के इफ्तताह से इनकार की बहुत से इतिहासकारों ने तारीफ की है क्योंकि 1925 की बमबारी में दमिश्क तबाह हुआ और हजारों लोग मारे गए थे 
अल जजायर से ताल्लुक रखने वाले अल्लामा अब्दुल हमीद बिन बादेस ने सबसे पहले अपने रिसाले जरीदा अल बसायर में इसका राज फाश किया किया की यह मुफ्ती फ्रेंच इंटेलिजेंस का अफसर है 
मौजूदा दौर में भी मुसलमानों की सफों में ऐसे लोग हैं जो जाहिर तौर पर मुसलमान हैं मगर काम अपने सलीबी आका के लिए करते हैं उनका काम मुसलमानों को जद्दोजहद से दूर रहने की कोशिश करना जद्दोजहद की मुखालफत करना जैसा कि इससे क़ब्ल यही काम बहुत से लोगों ने किया है अपने आकाओं को खुश करने के लिए

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