फिल्म मेकर ने पूछा सवाल क्या भारतीय मुस्लिम कभी पीएम या राष्ट्रपति बन पाएंगे ?

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देश को नया राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति जल्द ही मिलने वाला है। इसी बीच अब केंद्र सरकार में मुस्लिमों के भागीदारी को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। फिल्ममेकर प्रीतिश नंदी ने ट्वीट कर सवाल पूछा है कि क्या भारतीय मुसलमान कभी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनेगा? इस पर तमाम लोग अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

प्रीतिश नंदी ने ट्वीट कर लिखा कि ‘भारतीय मूल की महिला अमेरिका की उपराष्ट्रपति हैं। एक भारतीय मूल के व्यक्ति को ब्रिटेन का प्रधानमंत्री होने वाला है। लेकिन क्या भारतीय मूल का मुसलमान फिर कभी भारत का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनेगा? क्या आप प्रत्येक 7 भारतीयों में से 1 को उच्च राजनीतिक पद के लिए अपात्र बना सकते हैं?’

लोगों की प्रतिक्रियाएं: ऋषि बागरी ने लिखा कि ‘हिंदू पाकिस्तानी या हिंदू बांग्लादेशी की तुलना में भारतीय मुसलमान के पीएम बनने की अधिक संभावना है।’ हर्ष गुप्ता नाम के यूजर ने लिखा कि ‘100%, अगर वह अब्दुल कलाम हैं तो और अगर वह हामिद अंसारी हैं तो कभी नहीं। इंग्लैंड और अमेरिका देशभक्त चुन रहे हैं। आपका प्रश्न सोनिया गांधी के प्रति सहानुभूति में अधिक लगता है।’

एक यूजर ने लिखा कि ‘एक भारतीय मूल का मुसलमान किसी भी दिन प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकता है यदि वह राष्ट्र को धर्म से पहले रखता है। कुछ लोग तो राष्ट्रगान के लिए खड़े होने से भी मना कर देते हैं, इसके लिए आपका क्या कहना है?’ शशांक शेखर झा ने लिखा कि ‘यूएस और यूके में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विशिष्ट मंत्रालय और विशेष विशेषाधिकार नहीं हैं। इसके बारे में भी बात कीजिये।’

पल्लवी नाम की यूजर ने लिखा कि ‘क्या बीजेपी ने एपीजे अब्दुल कलामजी को भारत का राष्ट्रपति नहीं बनाया? क्या मुस्लिम होना ही उनकी एकमात्र योग्यता थी? भारत को अब तक कौन सा मुस्लिम पीएम मिला है? कांग्रेसियों ने अहमद पटेल को पीएम क्यों नहीं बनाया? हर व्यक्ति को योग्यता के बजाय धार्मिक पहचान की राजनीति के चश्मे से क्यों देखें?’

बता दें कि सोशल मीडिया पर जब प्रीतिश नंदी के इस ट्वीट को लेकर लोगों ने घेरना शुरू कर दिया तो उन्होंने एक और ट्वीट कर लिखा कि ‘मैं एक साधारण सा प्रश्न पूछ रहा था। मुझे ट्रोल करके असली मुद्दे को दरकिनार कर रहे हैं। क्या ऐसी नियुक्तियों में योग्यता की कोई भूमिका रह जाती है या हम जाति, लिंग, आस्था और क्षेत्रीय पहचान के विचारों के आगे झुकते रहेंगे?’

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