सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के पिछले साल जुलाई में दिए गए उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें आवारा कुत्तों को खिलाने के संबंध में दिशा-निर्देश दिए गए थे। हाईकोर्ट ने कहा था कि सामुदायिक कुत्तों को खाने का अधिकार है और नागरिकों को उन्हें खिलाने का अधिकार है।

इन्हें जारी हुआ नोटिस

न्यायमूर्ति विनीत सरन और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ एक गैर सरकार संगठन की ओर से दायर की गई अपील पर दिल्ली सरकार, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया और अन्य को नोटिस जारी किया है। पीठ ने कहा कि यह नोटिस छह सप्ताह में वापस किया जा सकता है। इस बीच आदेश पर रोक बरकरार रहेगी।

शीर्ष अदालत 24 जून 2021 को हाईकोर्ट के फैसले को ह्यूमन फाउंडेशन फॉर पीपल एंड एनिमल्स की ओर से दी गई चुनौती की अपील पर सुनवाई कर रही थी। एनजीओ का तर्क दिया था कि हाईकोर्ट के फैसले से आवारा कुत्तों के लिए खतरा बढ़ जाएगा। एनजीओ ने कहा कि लोगों के बीच में रहने वाले कुत्तों को आक्रमक प्रवृत्ति और लोगों पर हमला करने से रोका जा सकता है लेकिन आवारा कुत्तों के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए किसी भी सार्वजनिक स्थान पर लोगों द्वारा आवारा कुत्तों को खाना खिलाना लोगों के लिए ही जोखिम भरा हो सकता है।

यह था हाईकोर्ट का फैसला हाईकोर्ट ने उपने फैसले में कहा था कि आवारा कुत्तों को खाने का अधिकार है और नागरिकों को भी उन्हें खिलाने का अधिकार है। ऐसा करने के दौरान लोगों को सावधानी बरतनी होगी ताकि यह सुनिश्चत हो सके कि यह दूसरों पर आक्रमण नहीं करता है। एनिमल वेलफेयर बोर्ड और हर इलाके के आरडब्ल्यूए को ऐसी जगह निर्धारित करनी चाहिए, जहां लोग कुत्तों को खाना दे सकें। कोर्ट ने इस आदेश में यह भी कहा था कि कुत्तों को उनके इलाके से नहीं हटाना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा था कि आवारा कुत्ते सामुदायिक मैला ढोने वालों की भूमिका निभाते हैं और क्षेत्र में रोडन्ट आबादी को भी नियंत्रित करते हैं। साथ ही लेप्टोस्पायरोसिस जैसी बीमारियों के प्रसार को रोकते हैं। वे उन लोगों को भी सहयोग प्रदान करते हैं जो उन्हें खिलाते हैं और उनके तनाव निवारक के रूप में कार्य करते हैं।

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