वर्ष 2014 के बाद दुनिया भर में तेल की क़ीमतें एक बार फिर रिकॉर्ड स्तर पर हैं. तेल निर्यातक देशों के समूह ओपेक प्लस के बीच उत्पादन बढ़ाने को लेकर सहमति न बन पाने की वजह से ऐसा हुआ है.

अमेरिकी तेल की क़ीमतें तकरीबन 70 डॉलर प्रति बैरल की दर पर पहुँच गई. कोरोना महामारी के कारण पिछले साल ओपेक देशों ने तेल की आपूर्ति में कटौती की थी.

हालाँकि अब दुनिया की अर्थव्यवस्था उबर रही है और वैश्विक स्तर पर तेल की माँग में उछाल आया है. 

लेकिन इसके बावजूद सोमवार को ओपेक और उसके सहयोगी देशों के बीच पिछले साल तेल की आपूर्ति बढ़ाने को लेकर हुई बातचीत नाकाम रही.

ओपेक प्लस देशों के बीच सहमति न बन पाने की मुख्य वजह ये थी कि संयुक्त अरब अमीरात अपने लिए बेहतर शर्तों की मांग कर रहा था.

यूएई का एतराज़

माना जाता है कि ओपेक प्लस देशों की कमान सऊदी अरब और रूस के हाथ में है. सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच सार्वजनिक तौर पर किसी मुद्दे को लेकर मतभेद कम ही देखा गया है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि यूएई और सऊदी अरब के मतभेदों को दूर करने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई और ओपेक प्लस देशों की बैठक बीच में ही ख़त्म करनी पड़ी.

अगली बैठक की तारीख़ को लेकर भी कोई सहमति नहीं बन पाई, इसका मतलब ये हुआ कि अभी उत्पादन का जो स्तर है, वो आगे भी बरकरार रहेगा.

विश्लेषकों का कहना है कि अगर हालात यही रहे, तो तेल की क़ीमतों में तेज़ वृद्धि होगी और इसका असर पहले से ही कमज़ोर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

ठीक इसके उलट, अगर ओपेक प्लस देशों ने तेल उत्पादन के लिए निर्धारित अपने कोटे को नज़रअंदाज़ करने का क़दम उठाया तो तेल की क़ीमतों का गिरना तय है.

सऊदी अरब और यूएई के मतभेद

पिछले हफ़्ते संयुक्त अरब अमीरात ने उत्पादन बढ़ाने के प्रस्ताव को इसलिए रोक दिया था, क्योंकि वो अपने लिए बेहतर शर्तों की मांग कर रहा था.

सऊदी अरब ने ओपेक में अगस्त से दिसंबर, 2021 तक प्रति दिन दो मिलियन बैरल तेल का उत्पादन बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था लेकिन साथ ही बची हुई कटौती को साल 2022 के आख़िर तक जारी रखने की बात भी कही गई थी.

लेकिन यूएई की दलील है कि अप्रैल, 2022 की डेडलाइन के बाद तेल उत्पादन में कटौती करना ‘उसके साथ ग़ैरवाजिब’ होगा. 

यूएई का कहना है कि पिछले साल महामारी के कारण तेल की खपत में आई कमी के बाद बाज़ार को कच्चे तेल के उच्च स्तर के उत्पादन की सख़्त ज़रूरत है.

विश्लेषकों का कहना है कि यूएई और सऊदी अरब के बीच ओपेक की नीति को लेकर मतभेदों से दुनिया की दो सबसे बड़ी अरब अर्थव्यवस्थाओं की आर्थिक प्रतिस्पर्धा के संकेत मिल रहे हैं. आने वाले समय में ये बढ़ भी सकती है.

सऊदी नेशनल बैंक के सीनियर इकॉनॉमिस्ट समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहते हैं, “ओपेक देशों के बीच मौजूदा गतिरोध से ऐसा लगता है कि यूएई अपने आर्थिक और राष्ट्रीय हितों को सऊदी अरब से दोस्ती पर तरजीह दे रहा है.”

सऊदी अरब और यूएई की दोस्ती

यूएई के क्राउन प्रिंस ज़ायेद अल-नाहयान सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मब बिन सलमान के कट्टर समर्थक माने जाते हैं. 

वो चाहे यमन में सैनिक अभियान हो या फिर क़तर का बहिष्कार हो या मध्य पूर्व के इस्लामिक राजनीतिक गुटों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलना हो, दोनों नौजवान शहज़ादों के बीच की जुगलबंदी अरब देशों की आक्रामक विदेश नीति के रूप में दुनिया पहले ही देख चुकी है. 

लेकिन एक और जहाँ सऊदी अरब तेल पर अपनी अर्थव्यवस्था की निर्भरता कम करना चाहता है, तो दूसरी ओर विदेशी पूँजी और प्रतिभा को लेकर यूएई से उसकी होड़ भी दिखाई देती है.

हालाँकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में व्यापार और पर्यटन के गढ़ माने जाने वाले यूएई को चुनौती देने में अभी वक़्त लगेगा.

अमीराती राजनीतिक विश्लेषक अब्दुल खालेक अब्दुल्ला समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहते हैं, “दो सबसे बड़ी अरब अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तेज़ी से बढ़ रही है और आने वाले दिनों में ये और तेज़ होगी. यूएई अपनी समझ से बात कर रहा है. लेकिन दोनों देशों के रिश्ते काफी मज़बूत हैं और उनका नेतृत्व ये जानता है कि मुद्दे कैसे सुलझाए जा सकते हैं.”

तेल का हिसाब-किताब

बीते दिनों ओपेक देशों ने माँग बढ़ने के कारण तेल उत्पादन बढ़ाया था लेकिन अब जिस तरह से तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं, ओपेक प्लस देशों का फ़ैसला इससे प्रभावित हो सकता है. पिछले साल जब कोरोना महामारी की शुरुआत हुई थी, तो तेल की माँग में अचानक कमी आ गई थी.

तब सऊदी अरब और रूस की अगुवाई वाले इस संगठन ने तेल से होने वाली कमाई बरकरार रखने के लिए उत्पादन में बड़ी कटौती की थी. ओेपेक के 13 सदस्य देश और ओपेक प्लस में उनके 10 साथी देशों के समूह को इस रणनीति का फ़ायदा हासिल हुआ और तेल की क़ीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक सुधर गई.

फ़िलहाल ओपेक प्लस देशों का समूह बड़ी एहतियात के साथ तेल उत्पादन को नियंत्रित कर रहा है. हालाँकि तेल का बाज़ार जिस तरह से मज़बूत हो रहा है, ये उत्पादक देशों के लिए वरदान ही है.

कुछ देशों ने फ़ायदे के लिए उत्पादन बढ़ा दिया है लेकिन इसके अपने जोखिम भी हैं. समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ रूस उत्पादन बढ़ाने के पक्ष में रहा है. ओपेक प्लस की पिछली कई बैठकों में रूस का रुख़ यही रहा है.

सैक्सोबैंक के ओले हानसेन के मुताबिक़ “मुमकिन है कि रूस उत्पादन बढ़ाने का समर्थन करे ताकि वो अपनी बड़ी बाज़ार हिस्सेदारी को सुनिश्चित कर सके. साथ ही, ग़ैर ओपेक देश तेल का उप्तादन न बढ़ा लें, रूस ये भी सुनिश्चित करना चाहेगा.”

भारत की अपील को ओपेक ने किया था अनसुना

हालाँकि आईएनजी बैंक के वॉरेन पैटरसन का कहना है कि “दबाव केवल ओपेक प्लस देशों के समूह के भीतर से ही नहीं है बल्कि बड़े ख़रीदार देश भी बाज़ार में नरमी चाहते हैं क्योंकि कई देश अभी कोविड लॉकडाउन से उबर ही रहे हैं.”

तेल विश्लेषक स्टीफन ब्रेनॉक का कहना है कि भारत इसका उल्लेखनीय उदाहरण है. दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश बीते महीनों में कोरोना संकट से बुरी तरह से प्रभावित रहा है. भारत ने ओपेक प्लस देशों से तेल की बढ़ती क़ीमतों पर लगाम लगाने के लिए क़दम उठाने की अपील की थी.

लेकिन ओपेक और उसके साथी देश कच्चे तेल के उत्पादन पर लागू नियंत्रण हटाने की भारत की अपील को अनसुना कर चुके हैं.

भारत सरकार में पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कुछ महीने पहले ओपेक देशों की बैठक से पहले उनसे अपील की थी कि कच्चे तेल के दाम में स्थिरता लाने के लिए वे उत्पादन पर लागू प्रतिबंधों को कम कर दें.

उस समय सऊदी अरब ने भारत से कहा था कि पिछले साल जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें काफ़ी कम थीं, उस समय ख़रीदे गए तेल का इस्तेमाल भारत अभी कर सकता है.

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