महाराष्ट्र: AIMIM नेता अकबरुद्दीन ओवैसी पहुंचे आलमगीर औरंगजेब (R.A) के मकबरे पर, जानिए उनके बारे में

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औरंगाबाद: अपने मुखर भाषणों के लिए प्रसिद्ध और aimim पार्टी के चीफ सांसद असदुद्दीन ओवैसी के छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने आज महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के खुल्दाबाद स्तिथ मुगल शासक सुल्तान आलमगीर औरंगजेब रहमतुल्लाह अलैहि के मकबरे पर पहुंचे है.

अकबरुद्दीन ओवैसी ने यहां सुल्तान आलमगीर औरंगजेब रहमतुल्लाह अलैहि की कब्र पर दुआ पढ़ी और चादर भी चढ़ाई.

आपको बता दे अकबरुद्दीन ओवैसी हाल फिलहाल महाराष्ट्र के दौरे पर है इससे पहले उनके जोरदार स्वागत के की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए है.

कौन है आलमगीर औरंगजेब रहमतुल्लाह अलैहि ?

आलमगीर औरंगजेब जिनका पूरा नाम मुहीदू दीन मुहम्मद है का जन्म 3 नवम्बर सन् 1618 में हुआ. वो छठे नंबर पर मुगल बादशाह है जिन्हें आलमगीर की उपाधि दी गई जिसका मतलब होता है विश्व विजेता! उनके शासन काल में ही अखंड भारत का सपना पूरा हुआ था क्यों कि उनकी सल्तनत पूरे भारतीय उपमहाद्वीप तक फैली थी.

वे छठे मुगल सम्राट थे, जिन्होंने लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर 49 वर्षों की अवधि तक शासन किया।व्यापक रूप से उन्हें मुगल साम्राज्य का अंतिम प्रभावी शासक माना जाता है, आलमगीर औरंगजेब ने फतवा-ए-आलमगिरी को संकलित किया, और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में शरिया कानून और इस्लामी अर्थशास्त्र को पूरी तरह से स्थापित करने वाले कुछ सम्राटों में से एक थे। वह एक कुशल सैन्य नेता थे जिसका शासन प्रशंसा का विषय रहा है.

वह एक उल्लेखनीय विस्तारवादी थे; उनके शासनकाल के दौरान, लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन करते हुए, मुगल साम्राज्य अपने चरम पर पहुंच गया। अपने जीवनकाल के दौरान, दक्षिण में जीत ने मुगल साम्राज्य का विस्तार 4 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक कर दिया, और उन्होने 158 मिलियन से अधिक जनसंख्या की आबादी पर शासन किया। उनके शासनकाल में, भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी विनिर्माण शक्ति बन गया था जिसने चीन को भी पीछे छोड़ दिया, जिसका मूल्य वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग एक चौथाई और संपूर्ण पश्चिमी यूरोप से अधिक था.

आलमगीर औरंगजेब रहमुल्लाहि अलही अपनी धार्मिकता के लिए प्रसिद्ध थे; उन्होंने पूरे कुरान को याद किया, हदीसों का अध्ययन किया और इस्लाम के अनुष्ठानों का सख्ती से पालन किया,और “कुरान की प्रतियां प्रतिलेखित कीं।” उन्होंने इस्लामी और अरबी सुलेख के कार्यों का भी संरक्षण किया।

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