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Saturday, March 2, 2024

Islam: क्या इस्लाम धर्म में जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की इजाजत है? जानें ‘कुरान’ क्या कहता है?

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Conversion in Islam: भारत में समय-समय पर जबरदस्ती धर्म परिवर्तन (religious conversion in india) की खबरें आती रहती हैं. जबरन धर्मांतरण कराने वालों पर आरोप लगता है कि उन्होंने बहला-फुलसाकर और गुमराह करके हिंदुओं को मुसलमान बनाया है.

ऐसे मामलों की जांच के दौरान कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आए हैं कि ऐसा कराने वाले दूसरे धर्म के गरीब युवाओं या उन दिव्यांगों को भी निशाना बनाते हैं जो बोलने और सुनने के काबिल नहीं हैं, यानी मूक-बधिर होते हैं.

धर्मांतरण रोकने के लिए बने कड़े कानून

पिछले कुछ सालों में धर्मांतरण के मामलों को लेकर आई बाढ़ के बीच इस धारणा ने जोर पकड़ा कि इस्लाम में जोर-जबरदस्ती है और मुस्लिम धर्म गुरु जबरदस्ती करके धर्म परिवर्तन करवाते हैं. ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कई राज्यों ने धर्म परिवर्तन को लेकर कड़े कानून बनाये हैं. लव जिहाद (Love Jihad) और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन (Forceful Conversion) के मामलों में शामिल लोगों पर काबू पाने के लिए सख्त प्रावधान रखे गए हैं.

क्या इस्लाम जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की इजाज़त देता है?

क्या इस्लाम जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की इजाज़त देता है? आज हम कुरान की रोशनी में इन्हीं कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे कि आखिर हकीकत में है क्या?

क्या कहता है कुरान?

इस्लाम के जानकारों के मुताबिक, इस्लाम धर्म में किसी किस्म की सख्ती या ज़बरदस्ती का कोई रिवाज नहीं है. इस हवाले से इस्लाम के विद्वान कुरान की एक आयत का हवाला देते हैं और वह आयत हैं:

इस्लाम में जबरदस्ती नहीं

ला इकराहा फिद्दीन( सूरा बकरा, आयत 256)ये आयत कुरान के सूरा अल बकरा में मौजूद है. इस आयत का आसान सा मतलब है कि धर्म (इस्लाम) में किसी भी तरह की कोई ज़बरदस्ती नहीं है. यानी धर्म में ज़बरदस्ती की कहीं भी कोई गुंजाइश नहीं है और इस्लाम में इस पर पूरी तरह से पाबंदी लगी हुई है.

वलौ शाआ रब्बुका ल-अमना मन फिल-अरडी कुल्लुहुम जमीआ. अफाअंता तुकरहुंन्नासा हत्ता यकूनू मोमिनीन

ये आयत कुरान के सूरा यूनुस में मौजूद है. इस आयत का मतलब है कि अगर रब चाहता तो सब के सब जो दुनिया में हैं वो मुसलमान होते. जब रब ने उन्हें जबरन मोमिन नहीं बनाया तो क्या तुम, लोगों पर ज़बरदस्ती करेंगे? यहां तक कि वह इस्लाम कुबूल कर ले. इस आयत का भी सीधा सा मतलब यही है कि किसी को ज़बरदस्ती इस्लाम की दावत नहीं दी जकती है.

इब्न कदामाह अल मकदूसी का बयान

इन आयतों को और साफ करते हुए इस्लाम के मशहूर कानूनविद इब्न कदामाह अल मकदूसी ने तो यहां तक लिखा है कि अगर किसी ने इस्लाम कबूल कर लिया है तो भी उसे तब तक मुसलमान ना माना जाए जब तक ये साबित ना हो जाए कि उसके साथ कोई ज़ोर जबरदस्ती तो नहीं की गई है.

जबरदस्ती धर्म परिवर्तन गुनाह

ये दो आयतें थीं कुरान की जिनमें साफ तौर पर ये कहा गया है कि किसी को ज़बरदस्ती इस्लाम में दाखिल नहीं किया जा सकता है और ये गुनाह का काम है. इससे साबित हो गया है कि बहला फुसलाकर, धोखेबाज़ी से या जबरदस्ती करके किसी इस्लाम में प्रवेश होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.

पैगंबर मोहम्मद साहब ने जबरदस्ती धर्म परिवर्तन से मना किया

सिर्फ कुरान ने इन बातों को कहा ही नहीं, बल्कि कुरान के लाने वाले पैगंबर मोहम्मद साहब ने इस बातों पर अमल करके भी दिखाया. हदीस में आया है कि पैगंबर मोहम्मद साहब के ज़माने में एक शख्स ने इस्लाम कुबूल कर लिया. लेकिन कुछ दिनों बाद उसने वापस अपने धर्म में जाने की इजाजत मांगी तो पैगंबर मोहम्मद ने उसे खुशी खुशी अपने पुराने धर्म में वापस लौटने की इजाजत दे दी और पैगंबर ने कोई ज़बरदस्ती नहीं की.

पैगंबर मोहम्मद के उत्तराधिकारियों ने भी पेश किया नमूना

पैगंबर मोहम्मद के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने भी इस मामले में किसी भी तरह की कोई ज़बरदस्ती से काम नहीं लिया और ना ही जोर-जुल्म का रास्ता अपनाया. एक बार वाक्या है कि खलीफा उमर एक बुजुर्ग ईसाई महिला को मिलने के लिए बुलते हैं. वह महिला आती हैं, लेकि खलीफा उमर से मिले बगैर ही वह महिला वापस चली जाती हैं. इसके बाद खलीफा उमर को काफी अफसोस होता है और वह कहते हैं मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई क्योंकि उस महिला ने कहीं ये ना सोच लिया हो कि मैं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम कबूल करने के लिए कह रहा हूं.

इन उदाहरणों से पता चलता है कि इस्लामिक धर्म ग्रंथों ने ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन को बहुत बुरा काम बताया गया है. यानी इसकी कतई इजाज़त नहीं दी गई है. इस्लाम के तमाम इतिहासकार, स्कॉलर्स और जानकार भी धर्म परिवर्तन को बहुत बुरा काम मानते हैं.

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Ahsan Ali
Ahsan Ali
Journalist, Media Person Editor-in-Chief Of Reportlook full time journalism.

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