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क्या इस्लाम में हिं’दु’ओं को ख़ू’न देना जायज़ है ? जानिये अहम मसअला बहुत लोग…

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कुरान पाक में अल्लाह ताला का फरमान है कि لَا یَنْهٰکُمُ اﷲُ عَنِ الَّذِیْنَ لَمْ یُقَاتِلُوْکُمْ فِی الدِّیْنِ وَلَمْ یُخْرِجُوْکُمْ مِّنْ دِیَارِکُمْ اَنْ تَبَرُّوْهُمْ وَتُقْسِطُوْٓا اِلَیْهِمْط اِنَّ اﷲَ یُحِبُّ الْمُقْسِطِیْنَ
अल्लाह तुम्हें इस बात से मना नहीं फ़रमाता कि जिन लोगों ने तुमसे दीन (के बारे) में जं’ग नहीं की और ना तुम्हें तुम्हारे घरों से (यानी वतन से)निकाला है कि तुम उनसे भलाई का सुलूक करो और उन से अदल-ओ-इन्साफ़ का बरताव करो,बे-शक अल्लाह अदल-ओ-इन्साफ़ करने वालों को पसंद फ़रमाता है।और मज़ीद फ़रमाया اِنَّمَا یَنْهٰکُمُ اﷲُ عَنِ الَّذِیْنَ قٰـتَلُوْکُمْ فِی الدِّیْنِ وَاَخْرَجُوْکُمْ مِّنْ دِیَارِکُمْ وَظٰهَرُوْا عَلٰٓی اِخْرَاجِکُمْ اَنْ تَوَلَّوْهُمْج وَمَنْ یَّتَوَلَّهُمْ فَاُولٰٓئِکَ هُمُ الظّٰلِمُوْنَ
अल्लाह तो सिर्फ तुम्हें ऐसे लोगों से दोस्ती करने से मना फ़रमाता है जिन्हों ने तुमसे दीन (के बारे) में जंग की और तुम्हें तुम्हारे घरों (यानी वतन) से निकाला और तुम्हारे बाहर निकाले जाने पर (तुम्हारे दुश्मनों की) मदद की।

और जो शख़्स उन से दोस्ती करेगा तो वही लोग ज़ालिम हैं।कुरान पाक की इन आयात की रोशनी में हम उन लोगों से भलाई कर सकते हैं जो हमारे साथ जंग नहीं करते और ना ही हमें घरों से निकालते हैं यानी फ़ित्ना फ़साद नहीं करते।ये भलाई माली हवाले से तआवुन करना भी हो सकती है और दीगर मुआमलात में मदद की सूरत में भी हो सकती है।और फरमान-ए-बारी ताला है: مَنْ قَتَلَ نَفْسًام بِغَیْرِ نَفْسٍ اَوْ فَسَادٍ فِی الْاَرْضِ فَکَاَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِیْعًاط وَمَنْ اَحْیَاهَا فَکَاَنَّمَآ اَحْیَا النَّاسَ جَمِیْعًاط

जिसने किसी शख़्स को बग़ैर क़िसास के या ज़मीन में फ़साद अंगेज़ी (की सज़ा) के बग़ैर(नाहक़) क़तल कर दिया तो गोया उसने (मुआशरे के)तमाम लोगों को क़तल कर डाला और जिसने उसे (नाहक़ मरने से बचा कर) ज़िंदा रखा तो गोया उसने (मुआशरे के) तमाम लोगों को ज़िंदा रखा (यानी उसने हयात-ए-इन्सानी का इजतिमाई निज़ाम बचा लिया)।

मज़कूरा बाला आयत मुक़द्दसा में मुस्लिम वग़ैर मुस्लिम की तक़सीम किए बग़ैर इन्सानी जान को क़तल करना,तमाम इन्सानियत को क़तल करने और इस को बचाना,तमाम हयात-ए-इन्सानी को बचाने के मुतरादिफ़ क़रार दिया गया है। इस लिए कोई हिन्दू हो या मुस्लिम उसके साथ बतौर-ए-इन्सान भलाई करने में कोई हर्ज नहीं है।हदीस मुबारका में है कि हज़रत जाबिर बिन अबदुल्लाह रज़ी अल्लाहु अनहु ने फ़रमाया:مَرَّتْ بِنَا جَنَازَةٌ فَقَامَ لَهَا النَّبِيُّ وَقُمْنَا لَهٗ، فَقُلْنَا: یَا رَسُولَ اﷲِ، إِنَّهَا جِنَازَةُ یَهُودِيٍّ قَالَ: إِذَا رَأَیْتُمْ الْجِنَازَةَ فَقُومُوا.

हमारे पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो हुज़ूर नबी अकरम सललल्लाहु ताला अलैहि वाला वसल्लम खड़े हो गए और आपके साथ हम भी खड़े हो गए।हम अर्ज़ गुज़ार हुए:या रसूल अल्लाह!ये तो किसी यहूदी का जनाज़ा है।आप सललल्लाहु ताला अलैहि वाला वसल्लम ने फ़रमाया:जब तुम जनाज़ा देखो तो खड़े हो जाया करो (ख़ाह मरने वाले का ताल्लुक़ किसी भी मज़हब से हो)।

और हज़रत अबदुर्रहमान बिन अब्बू लैला रज़ी अल्लाह अनहु से रिवायत है कि हज़रत सहलबिन हुनयफ़ और हज़रत-ए-क़ैस बिन साद रज़ी अल्लाह अन्हुमा क़ादसिया में बैठे हुए थे कि इन के पास से एक जनाज़ा गुज़रा।दोनों खड़े हो गए। इन से कहा गया कि ये तो यहां के गैर मुस्लिम शख़्स का जनाज़ा है।दोनों ने बयान फ़रमाया: إِنَّ النَّبِيَّ مَرَّتْ بِهِ جِنَازَةٌ، فَقَامَ فَقِیلَ لَهُ: إِنَّهَا جِنَازَةُ یَهُودِيٍّ، فَقَالَ: أَلَیْسَتْ نَفْسًا؟

(एक मर्तबा) हुज़ूर नबी अकरम सललल्लाहु ताला अलैहि वाला वसल्लम के पास से जनाज़ा गुज़रा तो आप सललल्लाहु ताला अलैहि वाला वसल्लम खड़े हो गए।अर्ज़ किया गया: ये तो यहूदी का जनाज़ा है।आप सललल्लाहु अलैहि वाला वसल्लम ने फ़रमाया: क्या ये (इन्सानी) जान नहीं है?कुरान पाक की इन आयात और हदीस से साबित हुआ होता है कि सभी के साथ में भलाई करनी चाहिए, और अगर किसी हिन्दू को खून की ज़रूरत हो तो उसे मुस्लिम खून भी दे सकते हैं।इस में कोई हर्ज़ नहीं है। इस्लाम भलाई का दरस देता है, और सभी के साथ भलाई से पेश आना चाहिए।

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