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UP में सामने दिख रही हार के चलते तो पीछे नहीं हट गए मोदी ?

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आज का दिन ऐतिहासिक है। दिन और तिथि भी शुभ है। गुरुनानक जी की आज जयंती है। देश दुनिया में प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। आज के ही दिन पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान कर दिया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ये कानून किसानों की बेहतरी के लिए लाए गए थे। लेकिन अफसोस है कि हम कुछ किसानों को ये बात समझाने में असफल रहे। पीएम ने आंदोलन कर रहे किसानों से वापस अपने घर लौट जाने की अपील की है। तो क्या 300 सांसदों वाली पार्टी देश के अन्नदाता को समझाने में फेल साबित हुई या इसके सियासी मायने कुछ और ही है।

आपको बखूबी याद होगा कि जब केंद्र की मोदी सरकार कृषि कानून को लेकर आई थी। तो वह इसे कृषि जगत का सबसे बड़ा रिफॉर्म कह कर ढ़ोल नगाड़े पीट रही थी। मोदी के सिपहसलार जिन्हें खेती का ‘ख’ का भी ज्ञान नहीं, वे भी इसकी खूबियां गिनाते हुए नहीं थकते थे।

विरोध करने वालों को कभी खालिस्तानी तो कभी चीन और पाक का एजेंट व गद्दार बताते थे। मगर अचानक से बीजेपी का यह हृदय परिवर्तन कैसे हो गया। साफ जाहिर है कि इसके पीछे सोची समझी रणनीति है। चुनावी नफा नुकसान का गणित है। जमीन पर आरएसएस , कार्डर व भारतीय किसान संघ की तरफ से अंदर खाने दी गई वह रिपोर्ट है। जिसे देखकर बीजेपी नेताओं के हाथ पांव फूलने लगे थे। जबकि, बीजेपी पीएम मोदी को कड़े फैसले लेने वाला पीएम बताती थी।

दरअसल, अगले साल की शुरूआत में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ‘दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है’। और फिलहाल लखनऊ में रुकावटें बीजेपी के लिए हद से अधिक है। 14 साल वनवास भोगने के बाद यूपी में बीजेपी सत्ता में वापस में आई थी। बीजेपी किसी भी कीमत पर यूपी में सत्ता को गंवाना नहीं चाहती है।

पश्चिमी यूपी वह रीजन है, जहां बीजेपी को साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भारी लीड मिली थी। और किसान आंदोलन का ताल्लुक मुख्यत पंजाब और हरियाणा के बाद यूपी के इस हिस्से से ही है। जिस कारण वोट में डेंट पड़ने का अनुमान था। इधर, पूर्वांचल के राजभर समुदाय के नेता ओपी राजभर भी एनडीए की गोदी से छिटक कर अखिलेश के पाले में बैठ गए हैं। जिसके चलते पूर्वांचल में भी बीजेपी की गणित गड़बड़ाने लगी है।

वहीं, केंद्र में बीजेपी की जीत की नींव दोनों दफे यानी साल 2014 व 2019 में यूपी ने ही रखी थी। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने इसके लिए रणनीति बनाई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों ने 80 में से 73 सीटें जीत ली थीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में कामयाबी की ये कहानी दुहराई गई और साल 2019 में 65 सीटों पर जीत का परचम लहराया।

यह वह कहानी के वर्तमान और भविष्य का हिस्सा था। लेकिन अब जो बताने जा रहे हैं, वह इतिहास की परतें खोलने वाला है।

अभी यूपी चुनाव सामने दिख रहा है तो सरकार ने पांव पीछे खींच लिए हैं। लेकिन, आप ठीक एक महीने पीछे यानी अक्टूबर में जाइए। याद तो होगा ही कि लखीमपुर खीरी में किसानों को मोनू भैया( आशीष मिश्रा) गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे के थार से कुचला गया था। कैसे हरियाणा सरकार और वहां के अफसर किसानों की सर फोड़ने की वकालत कर रहे थे। कैसे गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा थम्बस डाउन का इसारा किसानों को कर रहे थे, और अपने ऐतिहासिक इतिहास की बात कह कर धमकाने और दो मिनट में ठीक करने की बात कह रहे थे।

क्या तभी पीएम ने किसानों के अपमान व दर्द की सुध ली, नहीं। तभी पीएम खुद आंदोलनरत किसानों को अंदोलनजीवी व परजीवी बताते रहे। इसमें खुद सक्रिय भूमिका निभाने में मीडिया का एक बड़ा तबका सामने आ गया। सरकार समेत मीडिया का एक बड़ा धड़ा लोगों को ज्ञान बांचने लगा कि किसानों को कितना फायदा होगा। जबकि किसान इसका नुकसान समझाते रहे। दिल्ली बॉर्डर पर खड़े होकर संसद को आवाज देते रहे कि वे और गरीब हो जाएंगे। पूंजीपतियों के अधीन हो जाएंगे।

किसानों के इस आंदोलन को खत्म करने के लिए आईटी सेल ने भी बड़ी भूमिका अदा की। लगातार भ्रामक प्रचार फैलाते रहे। धर्म महजब नारे को लेकर आंदोलन को हिंदू-मुस्लिम, जाट- नॉन जाट , हिंदू सिख में बांटने की भरपूर कोशिश की। मिडिल क्लास को किसानों के खिलाफ भड़काया गया। किसानों के रास्ते में मोटी मोटी नुकीली कीलें गाड़ दी गईं। कंटीली तारें लगा दी गईं। गाजीपुर व सिंघु बॉर्डर को ‘एलओसी’ में तब्दील कर दिया गया।

सरकार एक साल तक किसानों को अपना ताकत दिखाती रही कि वह झुकने वाली नहीं है। किसान एक साल तक आंदोलन करते रहे। वे हटने वाले नहीं हैं। किसानों ने हर अपमान को अमृत की तरह पिया। विज्ञान भवन में होने वाली बातचीत के दौरान वे ज़मीन पर बैठकर अपनी रोटी खाई। उनके मार्च में हिंसा की स्थिति पैदा की गई ताकि किसान आंदोलन को बदनाम किया जाए। लेकिन सारे जतन फेल हो गए। आखिरकार बंजर जमीन को कुदाल व फावड़ से फाड़क उपजाऊ व फसलों से खेत को लहलहा देने वाले किसान जीत गए।

क्या है आखिर कृषि कानून ?

1 कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, 2020- इसके तहत किसान कृषि उपज को सरकारी मंडियों के बाहर भी बेच सकते हैं। सरकार के मुताबिक किसान किसी निजी खरीददार को भी ऊंचे दाम पर अपनी फसल बेच सकते हैं। सरकार के मुताबिक इससे किसानों की उपज बेचने के विकल्प बढ़ेंगे।

2) कृषि (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक, 2020- ये कानून अनुबंध खेती या कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की इजाजत देता है। इस कानून के संदर्भ में सरकार का कहना है कि वह किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती का रास्ता खोल रही है।

3) आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020- इसके तहत अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया गया। इनकी जमाखोरी और कालाबाजारी को सीमित करने और इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने जैसे प्रतिबंध हटा दिए गए हैं।

किसानों को क्या थी आपत्ति, सरकार क्या फायदे गिना रही थी

किसान इन तीनों कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। किसानों के मुताबिक इससे किसान बंधुआ मजदूर हो जाएगा और कृषि पूंजीपतियों के हाथ चली जाएगी। किसानों के मुताबिक ये उनका हित नहीं है बल्कि निजीकरण को प्रोत्साहन देने वाले हैं। एमएसपी को लेकर भी सरकार से लिखित आश्वासन चाहते हैं। जबकि, सरकार के मुताबिक ये कृषि कानून किसानों के लिए हितकारी है और इससे किसानों की आय बढ़ेगी।

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