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Saturday, December 3, 2022
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पाकिस्तान में OIC सम्मेलन छोड़ भारत आए पांच मुस्लिम देशों के विदेश मंत्री

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पाकिस्तान एवं सऊदी अरब द्वारा आयोजित इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के सदस्य देशों के विदेश मंत्री परिषद की 17वीं विशेष बैठक रविवार को इस्लामाबाद में हो रही है.

इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री ख़ान मोत्ताकी और OIC महासचिव भाग ले रहे हैं.

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ओआईसी के कुल 57 सदस्य देशों में से 20 विदेश मंत्री इस्लामाबाद बैठक में भाग ले रहे हैं जबकि 10 उप मंत्री या राज्य मंत्री अपने-अपने देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगठनों, जापान, जर्मनी और अन्य ग़ैर-ओआईसी देशों के प्रतिनिधियों को भी बैठक में आमंत्रित किया गया है.

लेकिन इसी बीच रविवार को भारत में अफ़ग़ानिस्तान में संकट एवं क्षेत्रीय संबंधों के मुद्दे पर बातचीत हो रही है, जिसमें मध्य एशियाई देशों किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान के विदेश मंत्री भाग ले रहे हैं. 

हालांकि, इन देशों ने पाकिस्तान में हो रही बैठक में अपने प्रतिनिधिमंडलों को भेजा है.तालिबान के विदेश मंत्री इस्लामाबाद में 

नई दिल्ली पहुंचे पांच देशों के विदेशमंत्री

भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर एक दिवसीय भारत-मध्य एशिया संवाद की अध्यक्षता कर रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान के अलावा क्षेत्रीय संबंधों और व्यापार पर चर्चा के लिए यह अपनी तरह का तीसरा सम्मेलन है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, ताजिक विदेश मंत्री सरोजुद्दीन मेहरूद्दीन इस वार्ता के साथ-साथ द्विपक्षीय यात्रा के सिलसिले में भारत का दौरा कर रहे हैं.

पिछले महीने 10 नवंबर को, इन सभी मध्य एशियाई देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने भारत में ऐसी ही एक अन्य बातचीत में भाग लिया था जिसका विषय अफ़ग़ानिस्तान था.

इस वार्ता में रूस और ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी मौजूद थे. दिल्ली में रविवार की बैठक में भाग लेने वाले देश ओआईसी के सदस्य हैं, और उनमें से तीन (ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान) अफ़ग़ानिस्तान के साथ सीमा साझा करते हैं.

लेकिन इनके विदेश मंत्रियों ने इस्लामाबाद में ओआईसी की बैठक में भाग लेने के बजाय भारत जाने का फैसला किया, जिससे पता चलता है कि वे भी अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर भारत के साथ सहयोग बनाए रखना चाहते हैं.

पाकिस्तान में ओआईसी शिखर सम्मेलन, भारत में संवाद

ओआईसी शिखर सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा कि ओआईसी के विदेशमंत्री परिषद के 17वें विशेष सत्र की मेजबानी करना पाकिस्तान के लिए बहुत ख़ुशी की बात थी.

उन्होंने कहा कि यह विशेष बैठक अफ़ग़ानिस्तान में बिगड़ते हालातों, ख़ासकर मानवता के सामने आने वाली चुनौतियों की समीक्षा करेगी और अफ़ग़ान लोगों की मदद के लिए ठोस कदम उठाएगी, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समर्थन और सहयोग की सख़्त ज़रूरत है.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व उप विदेश मंत्री महमूद सैकाल ने ट्विटर पर कहा है कि पाकिस्तान ने 1980 में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप पर ओआईसी विदेश मंत्रियों की एक बैठक की मेजबानी की थी, लेकिन इस बार एक तटस्थ ओआईसी सदस्य को इस बैठक की मेजबानी करनी चाहिए थी.

क्या नई दिल्ली में बैठक पाकिस्तान के जवाब में है?

दिल्ली में हो रही वार्ता में पांच मुस्लिम बहुल मध्य एशियाई देशों के विदेश मंत्रियों की भागीदारी के चलते कुछ पक्षों को ऐसा लग रहा है कि यह वार्ता एक तरह से इस्लामाबाद में हो रहे ओआईसी शिखर सम्मेलन की प्रतिक्रिया है.

स्थानीय भारतीय मीडिया के अनुसार, पांचों विदेश मंत्री भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संयुक्त रूप से मुलाक़ात करेंगे.

इस बैठक में भाग लेने वालों को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “हम सभी के अफ़ग़ानिस्तान के साथ गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. इस देश में हमारी चिंताएं और लक्ष्य समान हैं: एक व्यापक और प्रतिनिधि सरकार, आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के ख़िलाफ़ लड़ाई, निर्बाध मानवीय सहायता सुनिश्चित करना और महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा.”

उन्होंने दौरे पर आए मंत्रियों से कहा, “हमें अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की मदद करने के तरीके खोजने चाहिए.”

‘भारत-पाकिस्तान सम्मेलन की तुलना नहीं की जा सकती’

पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव अजाज चौधरी के मुताबिक़, इस्लामाबाद में बैठक काफ़ी अहम है क्योंकि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान का पड़ोसी देश है और इस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान में हालात नाजुक हैं. राजनीति की नहीं, अंतरराष्ट्रीय सहायता की आवश्यकता है. इसमें मुस्लिम जगत की भी भूमिका है.

उन्होंने बीबीसी उर्दू से कहा कि इस्लामाबाद में ओआईसी की बैठक का मकसद यह होना चाहिए कि अफ़ग़ान लोगों तक मदद कैसे पहुंचाई जाए.

भारत में अफ़ग़ानिस्तान पर बातचीत के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि वहां भारत की भूमिका हर कोई जानता है. 

उन्होंने कहा, “अगर वे तालिबान के संपर्क में नहीं रहे तो हमें इससे कोई लेना-देना नहीं है.”

उनके मुताबिक़ ज़ाहिर तौर पर हर कोई किसी न किसी तरह से अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता लाना चाहता है और अगर भारत की भी यही मंशा है तो समझ में आता है.

चौधरी के अनुसार, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान सहित मध्य एशियाई देशों के पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध हैं, इसलिए भारत और पाकिस्तान के सम्मेलन की तुलना नहीं की जा सकती.

उन्होंने कहा कि तालिबान के आने के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने के लिए विश्व शक्तियों पर दबाव डाला जा रहा था. “यह मानवीय करुणा की बात है, यह राजनीति नहीं है.”

उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद करनी चाहिए कि ओआईसी की बैठक से अफ़ग़ानों के लिए कोई रास्ता निकलेगा. और इस बात की फिक्र नहीं करनी चाहिए कि कोई भारतीय योजना पाकिस्तान में सम्मेलन को ख़राब कर सकती है या नहीं.

भारत में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत अब्दुल बासित भी इस बात से सहमत हैं कि दिल्ली में तीसरा वार्षिक सम्मेलन पहली बार नहीं हो रहा है और यह कई महीने पहले निर्धारित किया गया था. उनके विदेश मंत्रियों का जाना जरूरी था.

उन्होंने कहा कि दूसरी ओर, इस्लामाबाद में अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर विशेष ओआईसी बैठक केवल दो सप्ताह पहले निर्धारित की गई थी और कई विदेश मंत्री शामिल नहीं हो रहे थे. इस्लामाबाद में हुई बैठक में उनकी जगह उप मंत्रियों और विशेष प्रतिनिधियों ने भाग लिया. ऐसे में दोनों को जोड़ना उचित नहीं हैं.

अब्दुल बासित के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता सभी पक्षों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि यदि संकट बिगड़ता है, तो देश गृहयुद्ध में लौट सकता है, जो किसी के हित में नहीं है.

भारत का हित

भारत के विदेश मामलों की विशेषज्ञ अनुराधा चिनॉय ने बीबीसी उर्दू को बताया, “यह संवाद भारत और मध्य एशियाई देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हो रहा है. यह मध्य एशिया के बारे में है, ओआईसी के बारे में नहीं. जिस तरह भारत के सोवियत संघ के साथ अच्छे संबंध थे, अब उसके मध्य एशियाई देशों के साथ अच्छे संबंध हैं.”

उन्होंने कहा कि “अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया की चिंताएं हैं. ये स्थितियां अफगानिस्तान तक ही सीमित नहीं रहेंगी, जैसे लड़ाई केवल सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, वैसे ही मानवाधिकार संकट सीमाओं को पार कर सकता है.”

अनुराधा का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान की समस्या न केवल सुरक्षा का मुद्दा है बल्कि इससे शरणार्थी संकट भी पैदा हो सकता है और मादक पदार्थों की तस्करी बढ़ सकती है. भारत नहीं चाहता कि ओआईसी में कश्मीर का ज़िक्र हो लेकिन वह अपने फायदे के लिए ओआईसी देशों के साथ संपर्क बनाए रखता है, चाहे वह तेल हो या सुरक्षा का मसला हो.

उनके अनुसार, भारत शुरू से ही तालिबान से आतंकवाद पर अपनी चिंताओं के कारण दूर रहा है, लेकिन अब उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में एक सरकार स्थापित कर ली है.

“भारत पिछली अफ़ग़ान सरकार का बहुत समर्थक रहा है, लेकिन अब सुरक्षा के लिहाज़ से उस पर तालिबान के साथ संबंध रखने का दबाव है, अगर वे अपने यहां आतंकवाद रोकना चाहते हैं.”

भारत के एक विश्लेषक मनीष झा ने बीबीसी को बताया है कि भारत में हुए संवाद पर साझा बयान में क्षेत्रीय संबंधों और व्यापार पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए जो कि ईरान की ओर से संबंध प्रगाढ़ करने के लिए सुझाया गया था. इस प्रोजेक्ट का उपयोग किया जा सकता है.

इसके साथ ही उन्होंने कहा, “भारत सोचता है कि अगर वह मध्य एशियाई देशों के साथ संबंध बनाता है, तो वह अफ़ग़ानिस्तान में भी अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम होगा.”

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Jamil Khan
Jamil Khan
Jamil Khan is a journalist,Sub editor at Reportlook.com, he's also one of the founder member Daily Digital newspaper reportlook
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