नई दिल्ली, 20 दिसंबर: दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को लाल किले पर कानूनी अधिकार जताने वाली एक महिला की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने याचिका खारिज करने की बड़ी वजह इसमें हुई ‘170 साल की असाधारण देरी’ बताया है।

सुल्ताना बेहम नाम की महिला दिवंगत मिर्जा मोहम्मद बेदार बख्त की विधवा हैं, जो दिल्ली के आखिरी सुल्तान मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय के परपोता बताए जा रहे हैं। सुल्ताना बेहम ने दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी दी थी कि या तो उन्हें लाल किला पर कानूनी कब्जा दिलाया जाए या फिर भारत सरकार उसके बदले में उन्हें पर्याप्त मुआवजा दे। मुआवजे की रकम के तौर पर उन्होंने 1857 से लेकर अबतक के समय को शामिल कर रही थीं।

सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने सुल्ताना बेगम की लाल किले पर पैतृक अधिकार जताने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस रेखा पल्ली की बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस अर्जी में असाधारण देरी हो चुकी है और यह भी साफ किया कि कोर्ट इस केस की मेरिट पर नहीं जा रहा है। जब याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से कहा कि उसकी क्लाइंट निरक्षर हैं और वह इसी वजह से अबतक अदालत तक नहीं पहुंच पाईं तो जज ने कहा कि यह जवाब तर्कसंगत नहीं है। सुल्ताना बेगम ने खुद को अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के परपोते की विधवा बताया है और अदालत से यह गुजारिश की थी कि वह केंद्र को या तो लाल किला उसे सौंपने का निर्देश दे या फिर पर्याप्त मुआवजा दिलवाए।

अपनी याचिका में सुल्ताना बेगम ने दावा किया था कि वही अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर द्वितीय की असली और कानूनी वारिस हैं। याचिका के मुताबिक, ‘1857 में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने गद्दी से हटा दिया था और उनकी सभी संपत्ति को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने गैरकानूनी तरीके से अपने कब्जे में ले लिया था। 1960 में भारत सरकार ने बेदार बख्त के बहादुरशाह जफर द्वितीय के वंशज और वारिस होने के दावे की पुष्टि की। 1960 में गृह मंत्रालय, भारत संघ ने याचिकाकर्ता के पति बेदार बख्त को पेंशन देना शुरू किया। 15 अगस्त 1980 को, भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने मौजूदा याचिकाकर्ता सुल्ताना बेगम को पेंशन देना शुरू किया। भारत सरकार पेंशन के तौर पर बहुत कम दे रही है।’

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि लाल किले पर भारत सरकार ने अवैध कब्जा कर रखा है, जो कि उसकी पैतृक संपत्ति है और सरकार ना तो उसका मुआवजा देना चाह रही है या ना ही उस प्रॉपर्टी पर कब्जा ही दे रही है, जो कि याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों और आर्टिकल 300 ए का सीधा उल्लंघन होने के साथ ही मानवाधिकार का भी उल्लंघन है। इसलिए वह भारतीय संविधान के तहत अदालत से गुहार लगाने आई है।

सुल्ताना बेगम के पति मिर्जा मोहम्मद बेदार बख्त की 22 मई, 1980 को निधन हो गया था। उसके बाद 1 अगस्त 1980 से केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने सुल्ताना बेगम को पेंशन देना मंजूर किया। याचिका में प्रतिवादियों से याचिकाकर्ता को 1857 से अबतक के अवैध कब्जे के लिए भी मुआवजा दिलवाने की गुहार लगाई गई थी। 68 वर्षीय सुल्ताना बेगम अभी पश्चिम बंगाल में कोलकाता से सटे हावड़ा की मलिन बस्ती में रहती हैं। बेदार बख्त के बारे में दावा किया जाता है कि वह ‘रंगून से फरार होने में कामयाब’ हो गए थे।


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