उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित एक मंदिर में कुछ समय पहले नमाज अदा करने वाले मुस्लिम व्यक्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत दे दी। उसके खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोपों में केस दर्ज किया गया था। इसी मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि तर्कहीन और विवेकहीन गिरफ्तारियां सिर्फ मानवाधिकार का उल्लंघन हैं और पुलिस के पास गिरफ्तारी आखिरी विकल्प होना चाहिए।

किस मामले की सुनवाई कर रही थी हाईकोर्ट?: गौरतलब है कि 2 नवंबर को दिल्ली की एक संस्था खुदाई खिदमतगार के चार लोगों पर यूपी के मथुरा स्थित नंद महल मंदिर में कथित तौर पर नमाज पढ़ने के लिए केस दर्ज हुआ था। इनमें एक व्यक्ति फैसल खान था, जिसे दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। बाकियों की पहचान चांद मोहम्मद, आलोक रतन और नीलेश गुप्ता के तौर पर हुई थी। गिरफ्तारी के बाद 18 दिसंबर को फैसल खान को जमानत मिल गई थी। उसके चार साथियों में से एक चांद मोहम्मद को हाईकोर्ट ने मंगलवार को ही अग्रिम जमानत दी।

हाईकोर्ट में चांद मोहम्मद के मामले में सुनवाई के दौरान उसके वकील अली कंबर जैदी ने कहा कि सिर्फ कुछ फोटो वायरल होने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनके मुवक्किल का इरादा समाज में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का था। हालांकि, सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मोहम्मद को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।

जज बोले- अनुचित गिरफ्तारियां भ्रष्टाचार का मुख्य कारण:हालांकि, हाईकोर्ट की एकल जज बेंच ने कहा कि पुलिस के पास गिरफ्तारी आखिरी विकल्प होना चाहिए और यह सिर्फ तभी किया जाना चाहिए, जब आरोपी की गिरफ्तारी अनिवार्य हो या उसकी न्यायिक जांच करनी हो। जस्टिस सिद्धार्थ ने एक पुराने केस का हवाला देते हुए नेशनल पुलिस कमीशन की एक रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि भारत में पुलिस द्वारा गिरफ्तारियां पुलिस में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण हैं।

जज ने आगे कहा, “इस रिपोर्ट से साफ है कि तकरीबन 60 फीसदी गिरफ्तारियां या तो गैरजरूरी थीं या अनुचित। इस अनुचित पुलिस कार्रवाई की वजह से जेल का खर्च 43.2 फीसदी रहा है। जज ने कहा कि निजी स्वतंत्रता एक अहम मौलिक अधिकार है और इसे सिर्फ तभी कम किया जा सकता है, जब और कोई चारा न रहे। इसके बाद कोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी।

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