पश्चिमी उत्तरप्रदेश (Western Uttar Pradesh) और खासतौर से मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण को लेकर एक भजन बहुत प्रेम से गाया जाता है- “रात श्याम सपने में आए”, यह श्रीकृष्ण से भक्त के प्रेम और निकटता को बताता है.

अब यह भजन भक्तों और मंदिरों से निकल कर उत्तरप्रदेश की राजनीति में पहुंच गया है. उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) की राजनीतिक सभाओं में पहुंच गया. अखिलेश यादव ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण उनके सपने में आए और उन्होंने कहा कि इस बार यूपी में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) की ही सरकार बनेगी. यादव ने कहा कि एक बार नहीं, कई बार सपने में आए. तो क्या अब उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Elections) का नैरेटिव श्रीकृष्ण के इर्द-गिर्द बुना जाएगा? दरअसल यह सपना अखिलेश यादव को तब आया, जब बीजेपी के कुछ नेताओं की तरफ से मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) के मथुरा से चुनाव लड़ने का आग्रह किया गया.

बीजेपी के राज्यसभा सांसद हरिनाथ सिंह ने जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा (JP Nadda) से योगी को मथुरा से चुनाव लड़ाने का आग्रह किया तो यूपी की राजनीति में एक नई हलचल पैदा हो गई और सबसे पहले परेशान हुए समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव. एक इंटरव्यू में सांसद हरिनाथ यादव ने कहा, “रात में मेरी दो बार आंख खुली और दोनों बार मेरे सामने योगी जी का चित्र आया और मुझे लगा कि भगवान कृष्ण मुझे निर्देश दे रहे हैं कि योगी जी को मथुरा से चुनाव लड़ना चाहिए और मैं अपने नेतृत्व से बात करूं, इसलिए मैंने राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा जी को पत्र लिखा”.

‘अयोध्या तो झांकी है, काशी मथुरा बाकी है’

उत्तरप्रदेश विधानसभा का पिछला चुनाव 2017 में रामजन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण के वादे के साथ लड़ा गया. इससे पहले 2014 में नरेन्द्र मोदी ने जब उत्तरप्रदेश में वाराणसी से चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, तो उससे पूरे प्रदेश में बीजेपी को नई ऊर्जा मिल गई. साल 2019 में राम मंदिर निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला और फिर 2020 में मंदिर निर्माण शुरू होने से अयोध्या और राम मदिर निर्माण अभियान की राजनीतिक ताकत पूरी तरह बीजेपी के हाथ में आ गई. साल 2021 में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन से बीजेपी को यूपी का एक और बड़ा धार्मिक केन्द्र राजनैतिक तौर पर अपनी ओर आता दिखा है. गोरखपुर का प्रतिनिधित्व खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं तो वहां उसके लिए ज़्यादा मुश्किल नहीं है. अब केवल मथुरा ही ऐसा केन्द्र रहा जहां बीजेपी नए अभियान की तलाश कर रही है. इसका पहला इशारा उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या ने ट्वीट कर श्रीकृष्णभूमि के लिए रास्ता खोल दिया.

विश्व हिन्दू परिषद् और संघ परिवार एक जमाने तक यह नारा लगाता रहा – ‘अयोध्या तो झांकी है, काशी मथुरा बाकी है’. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी लगातार मथुरा और आसपास के इलाके में आते-जाते रहे हैं. पिछले चार साल में करीब बीस बार मुख्यमंत्री का मथुरा में कार्यक्रम रहा है, इसके साथ ही वे वहां संतों से मुलाकात करते रहे हैं. पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने अमरोहा में कहा – “हमने कहा था कि अयोध्या में प्रभु राम के भव्य मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ कराएंगे, प्रधानमंत्री मोदी जी ने यह कार्य प्रारंभ करा दिया है. काशी में भगवान विश्वनाथ का धाम भी भव्य रूप से बनाया जा रहा है तो उसके बाद मथुरा वृंदावन कैसे छूट जाएगा”? यानि उनका इशारा श्रीकृष्ण जन्मभूमि तक पहुंचने का रहा होगा.

किसान आंदोलन के नुकसान की भरपाई मथुरा से होगी?

इससे पहले योगी आदित्यनाथ ने कहा, “मथुरा से चुनाव लड़ने का कोई कार्यक्रम नहीं है. पार्टी जहां से कहेगी, वहां से चुनाव लड़ूंगा, लेकिन मथुरा पावन धाम है और अपने पावन धाम से यह भाग्य हमें प्राप्त हो. मैं पहली बार यहां नहीं आया हूं, मैं 19वीं बार यहां आया हूं. हमारा सौभाग्य है कि सप्तपुरियों में से तीन पुरी हमारे यहां उत्तरप्रदेश में है, अयोध्या, मथुरा और काशी, तो उसमें मथुरा भी है. इन तीर्थों के लिए कुछ विकास करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, इससे ज़्यादा आनंद का अवसर और क्या हो सकता है”.

वैसे विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने मुझसे कहा कि “अभी हमारा ध्यान सिर्फ अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण पर है, मथुरा को लेकर फिलहाल कोई योजना नहीं है”. श्रीकृष्ण के सपने में आने की बात करके अखिलेश भले ही पश्चिमी उत्तरप्रदेश में अपनी जगह तलाश रहे हैं, लेकिन इस बहाने बीजेपी को यह मुद्दा उठाने का मौका मिल गया. बीजेपी अभी किसान आंदोलन से पश्चिमी यूपी में संभावित नुकसान को लेकर परेशान है और उसकी भरपाई के लिए श्रीकृष्ण जन्मभूमि एक अच्छा मुद्दा हो सकता है.

यूपी में साल 2017 के चुनाव में बीजेपी की जीत का बड़ा श्रेय पश्चिमी उत्तरप्रदेश को जाता है, जहां जाटों और किसानों ने बीजेपी का साथ दिया. तब बीजेपी को वहां 136 में से 109 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इस बार इसी इलाके में सबसे ज़्यादा असर किसान आंदोलन का रहा है, खासतौर से सहारनपुर मंडल की 38 सीटों पर उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसके साथ ही इसी इलाके में अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी के साथ हाथ मिला लिया है, जिनका जाट समुदाय पर खासा असर माना जाता है. यह भी बीजेपी के लिए चिंता का सबब बना हुआ है. इसके साथ बीजेपी पिछली बार की हारी हुई 27 सीटों पर भी फोकस किए हुए है. मेरठ में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की मौजूदगी उसे कितना फायदा दिलाएगी, यह अभी नहीं कहा जा सकता.

अखिलेश के लिए आगे कुआं पीछे खाई की स्थिति

हैरान नहीं होना चाहिए कि किसी दिन कोई बीजेपी नेता श्रीकृष्ण के सपने के बहाने अखिलेश को चुनौती दे दे कि क्या वो जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए तैयार हैं? तब समाजवादी यदुवंशी के लिए जवाब देना राजनीतिक तौर पर मुश्किल होगा. बीजेपी के नए राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने दावा किया है कि “श्रीकृष्ण उनके सपने में आए थे और उन्होने कहा कि मैं राम सेवकों पर गोलियां चलवाने वालों के सपने में नहीं आता हूं”. अखिलेश यादव का अगले कुछ समय में अयोध्या में विजय यात्रा पर जाने का कार्यक्रम भी है तो क्या वहां वो रामलला के दर्शन करने जाएंगे? या अयोध्या जाकर भी राम मंदिर नहीं पहुंचेंगे?, दोनों ही स्थितियों में समाजवादी पार्टी के लिए रास्ता आसान नहीं होगा.

दर्शन करने का मतलब कारसेवकों पर गोली चलाने के प्रायश्चित के तौर पर लिया जा सकता है और दर्शन के लिए नहीं जाने पर उनके विरोधियों को हमला करने का एक और हथियार मिलेगा, क्योंकि अयोध्या में 1990 में कार सेवकों पर मुलायम सिंह सरकार की गोलियों के घाव अब भी वहां भरे नहीं है.

क्या विवादित पूजा स्थलों को लेकर फिर से अदालतों में सुनवाई होगी?

श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर हाल में वृंदावन में भी संत समाज की एक बैठक हुई थी, लेकिन फिलहाल कोई आंदोलन चलाने का निर्णय नहीं किया गया. नब्बे के दशक में जब देश में राम जन्मभूमि विवाद गर्माया हुआ था, तब कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने 1991 में संसद से The Places Of Worship (Special Provisions) Act पास किया था. इस कानून के मुताबकि अयोध्या में राम जन्मभूमि को छोड़कर दूसरे विवादित पूजा स्थलों को 15 अगस्त 1947 की यथास्थिति में कायम रखा जाएगा. इससे जुड़े मसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी और दूसरे पूजा स्थलों को लेकर अगर कोई विवाद अदालत में चल रहा था तो उसे खारिज माना जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2019 में जब राम जन्मभूमि विवाद पर फ़ैसला सुनाया था, तब भी अपने फ़ैसले में इस क़ानून का ज़िक्र किया था और कहा कि इस तरह के विवादित मामलों पर अब अदालतों में सुनवाई नहीं की जाएगी. इस क़ानून को ही बीजेपी के नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने चुनौती दी है, उनकी याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया. अब यदि सुप्रीम कोर्ट इस क़ानून को रद्द करता है या सरकार को फिर से विचार के लिए कोई आदेश देता है तो इसके मायने हैं कि विवादित पूजास्थलों के मसलों को फिर से खोला जा सकता है और अदालत उनकी सुनवाई कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि विवाद पर अपने फ़ैसले में इस क़ानून पर विस्तार से करीब दस पेज में चर्चा की है.

भगवान राम, परशुराम और श्रीकृष्ण के सहारे है यूपी का विधानसभा चुनाव

कहा जाता है कि यूपी में साल 2017 का चुनाव “राम लहर” का था तो 2022 का “परशुराम लहर” पर चलेगा. इसलिए सबसे पहले बीएसपी नेता मायावती ने परशुराम और फिर ब्राह्मणों के प्रबुद्ध सम्मेलन शुरु किए. बीएसपी को तो 2007 में ब्राह्मण- दलित के सामाजिक समीकरण से बहुमत वाली सरकार बनाने का मौका मिला था. इस बार समाजवादी पार्टी ने भगवान परशुराम को याद किया है, उनकी मूर्तियां लगाने का वादा किया है. खुद अखिलेश यादव अपनी विजय यात्रा के दौरान भगवान परशुराम की प्रतिमा की पूजा करके और फरसा लेकर घूमते दिखाई दिए. ब्राह्मणों को साथ लाने और बीजेपी के ख़िलाफ माहौल बनाने की कोशिश सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं. कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी प्रयागराज से वाराणसी तक नाव यात्रा कर चुकी हैं और हर यात्रा के दौरान वो उस इलाके के प्रमुख मंदिर में पूजा अर्चना करना नहीं भूलतीं.

तो क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच फंस गए हैं भगवान. राम, परशुराम और अब श्रीकृष्ण भी आ गए हैं. भगवान राम और राम मंदिर ने कई बार बीजेपी की राजनीतिक नैया को पर लगाया है, तो क्या श्रीकृष्ण और भगवान परशुराम समाजवादी पार्टी का बेड़ा पार करा देंगे? क्या समाजवादी पार्टी का सरकार बनाने का सपना पूरा होगा? या फिर इस बार बीजेपी राम मंदिर के अलावा मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे को उठाकर लखनऊ की कुर्सी बरकरार रखेगी. जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण इस चुनाव में चर्चा में आ गए हैं तो फिर मुझे श्रीकृष्ण पर एक भजन याद आ रहा है, यह मां मुझे बहुत सुनाती थी, जो शायद राजनीतिक दलों को भाएगा- “प्रभो,आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, करता है तू कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है”.

Share this article

ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या  ट्विटर पर फॉलो करें.

Leave a comment